उपस्थित सभी महानुभाव,

यह कार्यक्रम कलकत्ता के एक सभागृह में हो रहा है, लेकिन देश के 115 स्था नों पर simultaneous यह कार्यक्रम चल रहा है। उस कार्यक्रम में उपस्थित भी सभी महानुभाव को मैं अपना प्रणाम करता हूं।

आज पूज्य। गुरूदेव रविंद्रनाथ टैगोर की जन्म जयंती का पावन पर्व है। बंगाल का स्म>रण करते हुए हर एक हिंदुस्ताटनी का सिर ऊंचा हो जाता है, आंखों में चमक आ जाती है, सीना चौड़ा हो जाता है। भारत के ऐतिहासिक जीवन की अनेक घटनाएं हैं, जिसकी प्रेरणा इस धरती से मिली। अगर परिवर्तन का कहीं प्रारंभ हुआ तो इसी धरती से हुआ। और गोखले जी कहा करते थे कि बंगाल जो आज सोचता है, हिंदुस्ताीन बाद में वही सोचता है।

और यह धरती एक समय था जब हिंदुस्ता्न की आर्थिक विकास की पूरी बागडोर उसके हाथ में थी। भारत की आर्थिक गतिविधि बंगाल से केंद्रित होती थी। इस धरती की विशेषता रही है कि मां दुर्गा की पूजा में तो लीन रहते हैं। लेकिन इसे सरस्वषती का भी आर्शीवाद है और साथ-साथ लक्ष्मी का भी आशीर्वाद है। और जहां सरस्वाती और लक्ष्मीm दोनों को आशीर्वाद मिले हो ऐसी यह धरती रही है। औद्योगिक जगत में भी manufacturing sector की बात करें, यही धरती है जिसने बहुत बड़ा योगदान किया है।

और अभी आदरणीय मुख्यजमंत्री जी अपने भाषण में उल्ले ख कर रहीं थी कि गांवों में बैंक भी नहीं है। 60 साल का हिसाब है यह। उनकी पीड़ा बहुत स्वालभाविक है, मैं भी उसमें अपना स्वनर जोड़ता हूं। लेकिन उन्हों ने यह बात मेरे सामने रखी, क्योंतकि उनको भरोसा है, अगर करेगा तो यही करेगा। आप कल्पूना कर सकते हैं कि देश में गरीबों के लिए बैंकों का राष्ट्री यकरण किया गया था। लेकिन इस देश के गरीब को कभी हमें बैंकों में देखने का अवसर नहीं मिला था।

आज भी यह जो स्कीाम लेकर के हम आए हैं, 80 से 90 Percent इस देश के लोग हैं, जिनको कोई insurance नहीं है, जिनको कोई पेंशन की संभावना नहीं है। सवा सौ करोड़ का देश, 80-90 प्रतिशत जनसंख्या, इन सामान्य आवश्यकताओं की पूर्ति उसके भाग्य में न लिखी हो तो कितनी पीड़ा होती है। और ये सारी योजनाएं जन्म ले रही हैं, आ रही हैं, वो गरीबों के प्रति हमारे दायित्व में से एक है, गरीबों के प्रति संवेदना में से एक है। और हम विकास कितना ही करें, नई ऊंचाइयों को कितना ही पाएं, प्राप्त करें। लेकिन अगर इसके सुफल गरीबों की झोंपड़ी तक नहीं पहुंचते हैं तो विकास अधूरा है। और इसलिए एक तरफ हम विकास की नई ऊंचाइयों को छूने के लिए सारी दुनिया को झकझोर रहे हैं, Make in India के लिए प्रेरित कर रहे हैं तो दूसरी तरफ गरीब से गरीब का बैंक का खाता खुले इसके लिए दिन-रात कोशिश करते हैं। और मुझे खुशी है कि जब प्रधानमंत्री जन-धन योजना हम लेकर के हम आए, 15 अगस्त को मैंने घोषित किया, 26 जनवरी तक पूरा करने की कल्पना थी, लेकिन देश के बैंकों में काम करने वाले सभी मित्रों ने इतनी मदद की, एक ऐसा जनांदोलन बन गया। 15 करोड़ नए खाते खोल दिए और आज देश में करीब-करीब 95 percent से ज्यादा लोग अर्थव्यवस्था की जो मुख्यधारा होती है Banking Sector उससे जुड़ गए हैं। जो कभी आधे भी नहीं थे।

ये काम सौ-सवा सौ दिन में पूरा कर दिया गया। और मैंने गरीबों को कहा था कि ये देश आपके लिए हैं, सरकार आपके लिए हैं, बैंक आपके लिए हैं। आपको एक पैसा देना नहीं है, बैंक का खाता खोलना है, Zero balance से। लेकिन गरीबों में अमीरी बहुत होती है। अमीरों की गरीबी की चर्चा करने की तो हिम्मत लोगों में कम होती है, लेकिन गरीबों की अमीरी की चर्चा मैं आज करना चाहता हूं। हमने तो कहा था Zero balance से खाते खोल देंगे। लेकिन मैं आज उन गरीबों को सलाम करता हूं कि उन्होंने मन में सोचा कि ये तो अच्छा नहीं है, ये तो हमें शोभा नहीं देता है। और मैं आज गर्व से कहता हूं कि ये जो 15 करोड़ बैंक खाते खुले उसमें 15 हजार 800 करोड़ रुपए राशि गरीबों ने जमा कर दी।

इस देश के गरीबों की अमीरी की ताकत देखिए। और तब जाकर के मन करता है, इन गरीबों के लिए कुछ करते रहना चाहिए। और मेरा ये विश्वास है, गरीबों को सहारा नहीं चाहिए। हमें हमारी सोच बदलनी होगी, हमारे कार्यकलाप बदलने होंगे, हमारे तौर-तरीके बदलने होंगे। गरीबों को सहारा नहीं चाहिए, गरीबों को शक्ति चाहिए। अगर उसको शक्ति मिलेगी तो गरीब गरीबी के खिलाफ लड़ाई लड़ने के लिए तैयार है और गरीबी से मुक्ति का आनंद लेने के लिए वो पूरी शक्ति लगाने के लिए तैयार है, उसे शक्ति देने की आवश्यकता है।

और आज जब गुरुदेव रविंद्र नाथ जी की जन्म जयंती की अवसर पर मैं बोल रहा हूं तब गुरुदेव ने 1906 में आत्मत्राण इस कविता में जो लिखा था, मैं समझता हूं 1906 की वो बात आज 2015 में भी हमें लागू हो रही है। गुरुदेव ने कहा था “It is not my prayer that you will save me from difficulties, give me the strength to overcome the difficulty. do not take away my burden or console me, give me the capacity to bear my burden” - यह बात गुरूदेव जी ने कही थी। और आज हमारा संकल्पe है उस आदेश का पालन करना जो गुरूदेव ने दिया है। और उसी में से यह योजना और कलकत्तेi की धरती पर हो रहा है। क्योंिकि मुझे विश्वांस है, जो चीज इस धरती से प्रारंभ होती है वो फिर आगे बढ़ती ही बढ़ती जाती है, परिणाम मिलता ही मिलता है। और रविंद्रनाथ जी के गुरूदेव की जन्मढ जंयती पर कोई चीज प्रारंभ होती हो और उन्होंंने जो भावना व्यिक्त की थी उसी की अभिव्य क्ति होती हो तो मुझे विश्वारस है गुरूदेव के आशीर्वाद इस योजना को सफल बनाएंगे और देश के गरीबों एक नई शक्ति प्राप्ति करने का अवसर प्रतिपादित होगा। यह मेरा पूरा विश्वारस है।

हमने जब प्रधानमंत्री जनधन योजना शुरू की तब कई लोगों को लग रहा था कि क्या् होगा, कैसे होगा लेकिन आज अनुभव यह आ रहा है कि गरीबों के लिए एक के बाद एक योजनाएं - एक बार बैंक खाता खुल गया, तो हम बात वहां रोकना नहीं चाहते। वो तो हमारा foundation था हम एक के बाद एक हमारी बातें unfold करते चले जा रहे हैं। हमने कहा आपको हैरानी होगी, इस देश में कुछ लोगों को सरकारी पेंशन मिलता है करीब 35 लाख लोग, करीब-करीब 35 लाख लोग और कितना पेंशन मिलता था? किसी को सात रुपया, किसी को 20 रुपया, किसी को सवा सौ, किसी को ढ़ाई सौ। बेचारे को पेंशन लेने के लिए जाना है इस उम्र में ऑटो रिक्शास में जाए या बस में जाए तो पेंशन से ज्याकदा खर्चा उसका बस में जाने से होता था। लेकिन यह चल रहा था। हमने आकर तय किया कि जिसको भी पेंशन मिलता है एक हजार से कम किसी को नहीं होगा। और हमने देना प्रारंभ कर दिया है। क्यों ? गरीब सम्माान से जीए, उसे शक्ति चाहिए। वो शक्ति देना का प्रयास उसको हमने आगे बढ़ाया।

हमारे देश में कभी-कभी लोगों को लगता है कि ये जो बहुत बड़े-बड़े औद्योगिक घराने हैं न वो देश में बहुत बड़ी आर्थिक क्रांति करते हैं। यह बहुत बड़ा भ्रम है। उनका योगदान है लेकिन बहुत सीमित है। देश के अर्थतंत्र को कौन चलाता है? जो छोटा-सा कारोबार करने वाला व्योक्ति है, चौराहे पर खड़े रहकर के सब्जीह बेचता है, धोबी की दुकान चलाता है, biscuit बेचता है, चाय-पान का गल्लाह चलाता है, कपड़े बेचता है, readymade garment बेचता है। छोटे-छोटे लोग! हिंदुस्ताान में करीब साढ़े पांच करोड़ से ज्याेदा ये लोग देश को अर्थतंत्र को गति देते हैं। और बड़े-बड़े औद्योगिक घराने बहुत कम लोगों को रोजगार देते हैं, यह पांच-साढ़े पांच करोड़ जो छोटे काम करने वाले लोग हैं, वे करीब 14 करोड़ लोगों को रोजगार देते हैं, आप कल्पोना कर सकते हैं यानि 14 करोड़ परिवारों का पेट भरने का काम इनके द्वारा होता है। और उनकी Total संपदा जो है इतने सारे लोगों की बहुत ज्या दा नहीं है। कोई 11-12 लाख करोड़ रुपया है। और वो जो पैसा उनको चाहिए interest से, बाजार से - कोई बैंक वाला उनको पैसा नहीं देता है, व्याोपारी बड़े छोटे हैं। इन सबका average जो कर्ज है वो seventeen thousand rupees है, average अगर निकाली जाए तो seventeen thousand. उनको साहूकारों से पैसा लेना पड़ता है। उस प्रकार की कंपनियों के वहां जाना पड़ता है पैसा लेने के लिए कि जिसमें उनका खून चूस लिया जाता है। हम गरीबों की भलाई के लिए काम करने वाली सरकार होने के कारण हम एक मुद्रा बैंक का Concept इस बजट में लाए हैं और बजट में लाए इतना ही नहीं अभी तो बजट सत्र चल रहा है, वो मुद्रा बैंक का काम आरंभ हो गया। और उसके अंतर्गत ये जो साढ़े पांच करोड़ सामान्य लोग हैं, जिनको 5 हजार, 10 हजार रुपया भी मिल जाए तो बहुत तेजी से अपने काम को बढ़ा सकते हैं। उनको बैंक loan देने के लिए एक बहुत बड़ा अभियान हमने चलाया है। उनको पैसे मिलने चाहिए, सरकार सामने से जाकर के पूछ रही है कि बताओ भाई तुम्हारे आगे बढ़ने की कोई योजना है क्या? गरीबों के लिए काम करना है, एक के बाद एक कैसे काम होते हैं।

उसी प्रकार से हमारे यहां, हम Corruption के खिलाफ भी बड़ी लड़ाई लड़ रहे हैं, एक ऐसी क्रांति ला रहे हैं जो इस प्रकार के Leakages को अपने आप ताले लग जाएंगे। हमारे यहां गैस सिलिंडर लेने वाले को सब्सिडी मिलती है। अमीर हो, गरीब हो सबको सब्सिडी मिलती है। हमने तय किया कि सब्सिडी Direct बैंक के खाते में जाएगी। जन-धन account खोल दिए, और उस बैंक के खाते में जिसके पास गैस सिलिंडर, Direct सब्सिडी जाएगी, ये दुनिया का सबसे बड़ा विक्रम है कि करीब 12 करोड़ से ज्यादा लोगों के खाते में भारत सरकार सीधी-सीधी गैस सिलिंडर की सब्सिडी देती है। और उसके कारण पहले किसी न किसी नाम से सब्सिडी जाती थी वो सारा बंद हो गया, पहले की तुलना में बहुत बड़ा फर्क आया है। आकंड़ा में बोलना नहीं चाहता हूं इसलिए क्योंकि मैं चाहता हूं कुछ खोज करने वाले लोग इसको खोजें, आप कल्पना नहीं कर सकते हैं अरबों-खरबों रुपयों का leakage था, अरबों-खरबों रुपयों का, जो हमने रोक दिया।

जन-धन account खुलते ही उसको follow-up में किस प्रकार से काम होता है, इसके ये उदाहरण है। और आज तीन नई योजनाएं हैं। हमारे देश, हम जब मुद्रा बैंक लाए तो हमने कहा था “Funding the Unfunded” जिनको Fund नहीं मिलता है, जिनके पैसे नहीं मिलते हैं, उनको Fund देंगे। जब हम जन-धन योजना लेकर के आए तो हमने कहा था, जिसको Banking की व्यवस्था नहीं है, उसको Banking की व्यवस्था, जिसका खाता नहीं, उसका खाता खोलेंगे और आज हम आए हैं कि जिसको सुरक्षा का कवच नहीं है, उसको हम सुरक्षा का कवच देंगे।

एक योजना है प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना - अभी फिल्म में हमने देखा, बड़ा चोट पहुंचाने वाला dialogue था कि 12 रुपए में कफन भी नहीं मिलता है। 12 रुपए में दो लाख रुपए की Insurance scheme हम लेकर के आए हैं, क्योंकि हम चाहते हैं कि देश के सामान्य व्यक्ति के जीवन में - क्योंकि संकट अमीर को नहीं आता है, संकट गरीब को आता है, फुटपाथ पर सोता है, बेचारे को मरना पड़ता है, साईकिल लेकर जाता है, मर जाता है, बच्चा स्कूल जाता है, बस के नीचे आता है, मरता है - उनकी सुरक्षा कौन करेगा? और इसलिए एक जागरुकता आए, भागीदारी बने और जैसे रविंद्रनाथ जी टेगौर ने हमें आदेश दिया है, गुरुदेव का आदेश है, उसको शक्ति दो - ये शक्ति देने का प्रयास है।

2 लाख रुपए का Insurance, अगर Injury हो गई, तो दो लाख रुपया भी मिल सकता है, एक लाख रुपया भी मिल सकता है। आप भी सोचिए, आपके यहां ड्राइवर होगा, आपके यहां झाड़ू-पोंछा करने वाले, कोई बाई काम करती होगी, खाना पकाने वाला कोई काम करता होगा। क्या आपको नहीं लगता है कि 12 रुपया खुद आपकी जेब से देकर के, उसको सुरक्षा का बीमा नहीं निकाल सकते आप? मैं इस देश के उन करोड़ों लोगों से आज प्रार्थना करना चाहता हूं कि आप अपनी जेब से, अपने यहां जो काम करने वाले लोग हैं, आपका ड्राइवर है, वो आपकी Society का lift man हो, गरीब लोग जिसके साथ आपका नेता, आपके मोहल्ले में झाडू लगाने आता है। आप उसे कहिए मेरे लिए 12 रुपये कुछ नहीं है। शाम को कभी कॉफी पीने जाता हूं तो 12 रुपये से ज्या दा खर्च करके आ जाता हूं। मैं तेरे लिए खर्च करूंगा। और अगर एक किस्तै बैंक में जमा कर दी और बैंक वालों को कह दिया कि ब्या ज उसका काटते रहिए, मुझे बताइये कि उसके जीवन को कितनी बड़ी सुरक्षा मिलेगी। और वो कभी आपको छोड़कर के जाएगा क्याउ? कभी नहीं जाएगा।

उसी प्रकार से प्रधानमंत्री जीवन ज्योोति बीमा योजना - पहले वाला जो 12 रुपये वाली स्की म में है Natural Calamity में भी अगर किसी के मृत्युन होती है तब भी उसको benefit मिलेगा। अगर आज ऐसी स्की म नेपाल में हुई होती, तो नेपाल में जो हादसा हुआ उसने परिवारजनों को सबको मदद मिल जाती। और Natural Calamity हमारे हाथ में नहीं होती है। उसी प्रकार से प्रधानमंत्री जीवन ज्योीति बीमा योजना 18 से 50 साल के उम्र के लोगों की है। आमतौर पर आपको मालूम है आप insurance निकालने जाए तो पता नहीं कितने डॉक्टेर आपको check करते हैं, कितना Medical checkup होता है - और वो तय करते हैं कि इनको दें या न दें। पता नहीं यह लुढ़क जाएगा तो। यह स्की म ऐसी है आपको सिर्फ form भरना है। अगर आप बीमार भी होंगे तो भी इसको बीमा मिल सकता है। पहली बार इस प्रकार की सोच के साथ हम आए हैं। गरीब से गरीब व्यीक्ति भी और per day एक रुपये से ज्यासदा नहीं है। 330 रुपये एक दिन का एक रुपया। अगर आप अपने ही employee को, even house wife भी अपना insurance निकाल सकती है। आप अपने छोटे-मोटे काम करने वाले अपने घर के साथ दुकान में काम करने वाले लोग, उनसे भी यह करवा सकते हैं। आप विचार कीजिए 330 रुपया एक व्यमक्ति के लिए साल में खर्च करना, न उनके लिए कोई कठिन है, न उनके लिए कोई करे तो भी कठिन नहीं है। लेकिन एक समाज को सुरक्षा देने का एक बहुत बड़ा काम हो सकता है।

तीसरी हमारी योजना आज जिसका हम प्रांरभ कर रहे हैं - अटल पेंशन योजना। आप देखिए कि हिंदुस्तापन में 10-15% लोगों को ही यह नसीब होता है पेंशन। बाकी सबके लिए बुढ़ापा कहां बिताएंगे चिंता का विषय है, कैसे बिताएंगे चिंता का विषय है। हमारे 60 साल से ऊपर के लोगों की जिंदगी कैसी हो? यह योजना ऐसी है जिसको वोट से लेना-देना नहीं है, क्योंीकि यह योजना का लाभ जब वो 60 साल का होगा, तब शुरू होगा। और अभी तो लगेगा हां यार योजना में जोड़ गया, लेकिन जब लाभ मिलना शुरू होगा न तब उसको रविंद्रनाथ टैगोर की याद आएगी, तब यह कोलकाता के कार्यक्रम की याद आएगी - और तब यह प्रसंग याद आएगा कि हां यार उस दिन यह हुआ था। अब बुढ़ापे में बच्चेद तो नहीं देख रहे, लेकिन यह मोदी जी कुछ करके गए थे यार, कुछ काम आ गया। सामान्यच रहते राजनेता उन योजनाओं को लाते हैं जिसके कारण अगले चुनाव में फायदा हो जाए। लेकिन मैं राजनेता नहीं हूं। मैं एक प्रधान सेवक के रूप में आया हूं। और इसलिए आज जो योजना लाया हूं उन नौजवानों के लिए हैं ताकि आप जब 60 साल के होंगे आपको कभी किसी के सहारे की जरूरत न पड़े। आपके भीतर की शक्ति हो, आपकी अपनी शक्ति हो। आप अपना गौरव के साथ बुढ़ापा भी बिता सको।

अगर आपकी आवश्य कता एक हजार रुपये की पेंशन की है तो उसकी स्की म है, दो हजार पेंशन चाहते हो तो उसकी स्कीयम है, तीन हजार पेंशन चाहते है तो उसकी स्की,म है, चार हजार चाहो तो उसकी स्की म है, पांच हजार चाहो तो उसकी स्कीचम है। और जून महीने से मई महीने तक उसका tenure है, उसमें जुड़ने का। बचत आपको करनी है, लेकिन यह पहली बार ऐसी पेंशन स्कीसम है कि सरकार उसमें गांरटी देती है और आपके पैसे कम पड़ गए तो पैसे भरने का जिम्मास सरकार लेती है। अगर आपको उसका रिटर्न कम मिलेगा तो उसकी जिम्मेावारी सरकार लेती है। और उसके कारण, सामान्य गृहणी भी ये अटल पेंशुं योजना के साथ जुड़ सकती है। किसान - कभी किसान ने सोचा है कि मेरे लिए पेंशन हो सकता है? इस योजना के साथ अगर आज 18 से 40 की उम्र का किसान का बेटा जुड़ा जाता है तो वो जब 60 साल का होगा, अपने आप उसका पेंशन आना शुरू हो जाएगी। एक सुरक्षा का माहौल बनेगा और उसी माहौल को बनाने के लिए सामान्य मानव के जीवन में... और खासकर के गरीब और निम्न, मध्यम वर्ग के लोग जो जीवन को एक संतोष के साथ जीना चाहते हैं, उनके लिए सरकार की योजनाएं होनी चाहिए।

और इसलिए वोट की राजनीति से हटकर के भी, समाज में अगर शक्ति पैदा करेंगे तो शक्तिशाली समाज स्वंय गरीबी के खिलाफ लड़ाई लड़ने के लिए एक बहुत बड़ी सेना बनकर के खड़ा हो सकता है। और हमारी कोशिश ये है, हमें गरीबी के खिलाफ लड़ाई लड़ना है लेकिन उस लड़ाई लड़ने के लिए हमारे सिपाही, हम गरीबों को वो ताकत देना चाहते हैं, वो स्वंय इस गरीबी के खिलाफ लड़ाई लड़ने के लिए हमारे सिपाही बनेंगे।

और इसलिए गरीबों के कल्याण के लिए आज इन तीन योजनाओं का आरंभ हो रहा है। मुझे विश्वास है कि देश के गरीब 115 स्थान पर इस कार्यक्रम को जो सुन रहे हैं। आज कार्यक्रम का आरंभ हो रहा है विधिवत रूप से, लेकिन हमने जब प्रधानमंत्री जन-धन योजना शुरू की थी तो एक हफ्ते पहले ट्रायल शुरू किया था कि भई देखो कैसे मामला गाड़ी चलती है। और तब हमारा अनुभव था प्रथम सप्ताह में जब हमने काम किया शुरू, नया था, लोगों को समझाना था। लेकिन एक सप्ताह के अंदर हम करीब 1 करोड़ लोगों के बैंक खाते खोलने में सफल हुए थे। वो भी अपने आप में एक बहुत बड़ा record था। इस बार भी हमने 1 मई से Trail basis पर काम शुरू किया था। बहुत बड़ा announcement नहीं किया था, ऐसे ही शुरू किया था। और आज मुझे गर्व के साथ कहना है कि इस 1 मई से शुरू किया हमने, इस 7 दिन के भीतर-भीतर 5 करोड़, 5 लाख लोगों ने enrolment करा दिया है।

ये अपने आप में सरकार की बातों पर भरोसा कितना है, स्वंय की सुरक्षा के लिए सामान्य मानव जुड़ने के लिए कितना आतुर है और हमारे banking sector के लोग भी सरकार के इस काम को करने के लिए कितने उमंग और उत्साह के साथ जुड़ रहे हैं, इसका ये जीता-जागता उदाहरण है। और मैं पश्चिम बंगाल को भी बधाई देता हूं, ये 5 करोड़, 5 लाख में, 42 लाख पश्चिम बंगाल में भी है, 42 lakhs. आने वाले दिनों में... क्योंकि 1 जून से योजना विधिवत रूप से प्रारंभ होने वाली है। अधिकतम लोगों से मेरा आग्रह है कि 1 जून के पहले इस योजना का लाभ लेने के लिए अपने निकट बैंकों का संपर्क करके, वो जुड़ें। और अटल पेंशन योजना में सरकार की तरफ से जो special incentive दिया जा रहा है, जिसमें सरकार आपको गारंटी दे रही है, सरकार कुछ न कुछ धन दे रही है, ये 31 December तक है। मैं चाहता हूं कि 31 December तक अटल पेंशन योजना में जो भारत सरकार का आपको योगदान मिल रहा है उसका फायदा उठाइए, जून महीने से कार्यक्रम प्रारंभ हो रहा है लेकिन इस बार हमने 30 अगस्त तक उसको लंबा किया है। तो मैं चाहूंगा कि 30 अगस्त के पहले इन तीन योजनाओं में सर्वाधिक लोग जुड़ें।

मुझे विश्वास है कि एक ऐसी सुरक्षा की व्यवस्था हम लेकर के आए हैं जो मूलतः गरीबों के लिए है, सामान्य मानव के लिए है और जो संपन्न लोग हैं, वे भी अपने यहां काम करने वाले लोगों के लिए इस काम में जुड़कर के अपने यहां काम करने वाले और कुछ तो परिवार ऐसे होते हैं दो-दो पीढ़ी तक एक परिवार उनके यहां काम करता है। ड्राइवर होंगे तो तीन पीढ़ी से ड्राइवर उनके यहीं काम करने वाले होंगे, एक प्रकार से वो परिवार के अंग बन जाते हैं। सरकार की ये योजना आपके माध्यम से गरीब की सेवा का एक कारण बन सकता है, आपके जीवन में भी संतोष का कारण बन सकता है। और आखिरकर ये धरती ऐसी है स्वामी विवेकानंद ने हमें दरिद्र नारायण की सेवा करने की प्रेरणा दी थी। ये धरती ऐसी है जहां से रामकिशन मिशन के द्वारा आज भी गरीबों के कितने सेवा के काम हो रहे हैं। हम भी उस संकल्प को लेकर के आगे बढ़ें, इस व्यवस्था का फायदा उठाएं, जन-धन की योजना को जन-कल्याण में परिवर्तित करें। इसी एक अपेक्षा के साथ मैं आपको बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं।

धन्यवाद।

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हमारी भाषा हमारी संस्कृति की संवाहक होती है: अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन में पीएम मोदी
February 21, 2025
Quoteहमारी भाषा हमारी संस्कृति की संवाहक होती है: प्रधानमंत्री
Quoteमराठी एक संपूर्ण भाषा है: प्रधानमंत्री
Quoteमहाराष्ट्र के अनेक संतों ने भक्ति आंदोलन के जरिए मराठी भाषा में समाज को नई दिशा दिखाई: प्रधानमंत्री
Quoteभारतीय भाषाओं में कभी कोई आपसी वैर नहीं रहा, बल्कि उन्होंने सदैव एक-दूसरे को अपनाया और समृद्ध किया है: प्रधानमंत्री

कार्यक्रम में उपस्थित वरिष्ठ नेता श्रीमान शरद पवार जी, महाराष्ट्र के लोकप्रिय मुख्यमंत्री श्री देवेंद्र फडणवीस जी, अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष डॉ तारा भवालकर जी, पूर्व अध्यक्ष डॉ रविंद्र शोभने जी, सभी सदस्यगण, मराठी भाषा के सभी विद्वतगण और उपस्थित भाइयों और बहनों।

अभी डॉक्टर तारा जी का भाषण पूरा हुआ तो मैंने ऐसे ही कहा थारछाण, तो उन्होंने मुझे गुजराती में जवाब दिया, मुझे भी गुजराती आती है। देशाच्या आर्थिक राजधानीच्या, राज्यातून देशाच्या, राजधानीत आलेल्या सर्व मराठी, सारस्वतांन्ना माझा नमस्कार।

आज दिल्ली की धरती पर मराठी भाषा के इस गौरवशाली कार्यक्रम का आयोजन हो रहा है। अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन एक भाषा या राज्य तक सीमित आयोजन नहीं है, मराठी साहित्य के इस सम्मेलन में आजादी की लड़ाई की महक है, इसमें महाराष्ट्र और राष्ट्र की सांस्कृतिक विरासत है। ज्ञानबा-तुकारामांच्या मराठीला आज राजधानी दिल्ली अतिशय मनापासून अभिवादन करते।

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भाइयों-बहनों,

1878 में पहले आयोजन से लेकर अब तक अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन देश की 147 वर्षों की यात्रा का साक्षी रहा है। महादेव गोविंद रानाडे जी, हरि नारायण आप्टे जी, माधव श्रीहरि अणे जी, शिवराम परांजपे जी, वीर सावरकर जी, देश की कितनी ही महान विभूतियों ने इसकी अध्यक्षता की है। शरद जी के आमंत्रण पर आज मुझे इस गौरवपूर्ण परंपरा से जुड़ने का अवसर मिल रहा है। मैं आप सभी को, देश दुनिया के सभी मराठी प्रेमियों को इस आयोजन की बहुत-बहुत बधाई देता हूं। आणि आज तर जागतिक मातृभाषा दिवस आहे. तुम्ही दिल्लीतील साहित्य सम्मेलनासाठी दिवस सुद्धा अतिशय चांगला निवडला।

साथियों,

मैं जब मराठी के बारे में सोचता हूं, तो मुझे संत ज्ञानेश्वर का वचन याद आना बहुत स्वाभाविक है। 'माझा मराठीची बोलू कौतुके। परि अमृतातेहि पैजासी जिंके। यानी मराठी भाषा अमृत से भी बढ़कर मीठी है। इसलिए मराठी भाषा और मराठी सांस्कृति के प्रति मेरा जो प्रेम है, आप सब उससे भलीभांति परिचित हैं। मैं आप विद्वानों की तरह मराठी में उतना प्रवीण तो नहीं हूं, लेकिन मराठी बोलने का प्रयास, मराठी के नए शब्दों को सीखने की कोशिश मैंने निरंतर की है।

साथियों,

ये मराठी सम्मेलन एक ऐसे समय हो रहा है, जब छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक के 350 वर्ष पूरे हुए हैं। जब पूण्यस्लोक अहिल्याबाई होल्कर जी की जन्मजयंति के 300 वर्ष हुए हैं और कुछ ही समय पहले बाबा साहेब अंबेडकर के प्रयासों से बने हमारे संविधान ने भी अपने 75 वर्ष पूरे किए हैं।

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साथियों,

आज हम इस बात पर भी गर्व करेंगे कि महाराष्ट्र की धरती पर मराठी भाषी एक महापुरूष ने 100 वर्ष पहले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का बीज बोया था। आज ये एक वटवृक्ष के रूप में अपना शताब्दी वर्ष मना रहा है। वेद से विवेकानंद तक भारत की महान और पारंपरिक सांस्कृति को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का एक संस्कार यज्ञन, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पिछले 100 वर्षों से चला रहा है। मेरा सौभाग्य है कि मेरे जैसे लाखों लोगों को आरएसएस ने देश के लिए जीने की प्रेरणा दी है। और संघ के ही कारण मुझे मराठी भाषा और मराठी परंपरा से जुड़ने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ। इसी कालखंड में कुछ महीने पहले मराठी भाषा को अभिजात भाषा का दर्जा दिया गया है। देश और दुनिया में 12 करोड़ से ज्यादा मराठी भाषी लोग हैं। मराठी को अभिजात भाषा का दर्जा मिले, इसका करोड़ों मराठी भाषियों को दशकों से इंतज़ार था। ये काम पूरा करने का अवसर मुझे मिला, मैं इसे अपने जीवन का बड़ा सौभाग्य मानता हूँ।

माननीय विद्वतजन,

आप जानते हैं, भाषा केवल उसके संवाद का माध्यम भर नहीं होती है। हमारी भाषा हमारी संस्कृति की संवाहक होती है। ये बात सही है कि भाषाएँ समाज में जन्म लेती हैं, लेकिन भाषा समाज के निर्माण में उतनी ही अहम भूमिका निभाती है। हमारी मराठी ने महाराष्ट्र और राष्ट्र के कितने ही मनुष्यों के विचारों को अभिव्यक्ति देकर हमारा सांस्कृतिक निर्माण किया है। इसीलिए, समर्थ रामदास जी कहते थे- मराठा तितुका मेळवावा महाराष्ट्र धर्म वाढवावा आहे तितके जतन करावे पुढे आणिक मेळवावे महाराष्ट्र राज्य करावे जिकडे तिकडे मराठी एक सम्पूर्ण भाषा है। इसीलिए, मराठी में शूरता भी है, वीरता भी है। मराठी में सौंदर्य भी है, संवेदना भी है, समानता भी है, समरसता भी है, इसमें आध्यात्म के स्वर भी हैं, और आधुनिकता की लहर भी है। मराठी में भक्ति भी है, शक्ति भी है, और युक्ति भी है। आप देखिए, जब भारत को आध्यात्मिक ऊर्जा की जरूरत हुई, तो महाराष्ट्र के महान संतों ने ऋषियों के ज्ञान को मराठी भाषा में सुलभ कराया। संत ज्ञानेश्वर, संत तुकाराम, संत रामदास, संत नामदेव, संत तुकड़ोज़ी महाराज, गाडगे बाबा, गोरा कुम्हार और बहीणाबाई महाराष्ट्र के कितने ही संतों ने भक्ति आंदोलन के जरिए मराठी भाषा में समाज को नई दिशा दिखाई। आधुनिक समय में भी गजानन दिगंबर माडगूलकर और सुधीर फड़के की गीतरामायण ने जो प्रभाव डाला, वो हम सब जानते हैं।

साथियों,

गुलामी के सैकड़ों वर्षों के लंबे कालखंड में, मराठी भाषा, आंक्रांताओं से मुक्ति का भी जयघोष बनी। छत्रपति शिवाजी महाराज, संभाजी महाराज और बाजीराव पेशवा जैसे मराठा वीरों ने दुश्मनों को नाको चने चबवा दिए, उनको मजबूर कर दिया। आज़ादी की लड़ाई में वासुदेव बलवंत फड़के, लोकमान्य तिलक और वीर सावरकर जैसे सेनानियों ने अंग्रेजों की नींद उड़ा दी। उनके इस योगदान में मराठी भाषा और मराठी साहित्य का बहुत बड़ा योगदान था। केसरी और मराठा जैसे समाचार पत्र, कवि गोविंदाग्रज की ओजस्वी कवितायें, राम गणेश गडकरी के नाटक मराठी साहित्य से राष्ट्रप्रेम की जो धारा निकली, उसने पूरे देश में आज़ादी के आंदोलन को सींचने का काम किया। लोकमान्य तिलक ने गीता रहस्य भी मराठी में ही लिखी थी। लेकिन, उनकी इस मराठी रचना ने पूरे देश में एक नई ऊर्जा भर दी थी।

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साथियों,

मराठी भाषा और मराठी साहित्य ने समाज के शोषित, वंचित वर्ग के लिए सामाजिक मुक्ति के द्वार खोलने का भी अद्भुत काम किया है। ज्योतिबा फुले, सावित्री बाई फुले, महर्षि कर्वे, बाबा साहेब आंबेडकर, ऐसे कितने ही महान समाज सुधारकों ने मराठी भाषा में नए युग की सोच को सींचने का काम किया था। देश में मराठी भाषा ने बहुत समृद्ध दलित साहित्य भी हमें दिया है। अपने आधुनिक चिंतन के कारण मराठी साहित्य में विज्ञान कथाओं की भी रचनाएँ हुई हैं। अतीत में भी, आयुर्वेद, विज्ञान, और तर्कशास्त्र में महाराष्ट्र के लोगों ने अद्भुत योगदान दिया है। इसी संस्कृति के कारण, महाराष्ट्र ने हमेशा नए विचारों और प्रतिभाओं को भी आमंत्रित किया और महाराष्ट्र ने इतनी प्रगति की है। हमारी मुंबई महाराष्ट्र ही नहीं, बल्कि पूरे देश की आर्थिक राजधानी बनकर उभरी है।

और भाइयों बहनों,

जब मुंबई का ज़िक्र आया है, तो फिल्मों के बिना न साहित्य की बात पूरी होगी, और न मुंबई की! ये महाराष्ट्र और मुंबई ही है, जिसने मराठी फिल्मों के साथ-साथ हिन्दी सिनेमा को ये ऊंचाई दी है। और इन दिनों तो ‘छावा’ की धूम मची हुई है। सांभाजी महाराज के शौर्य से इस रूप में परिचय शिवाजी सावंत के मराठी उपन्यास ने ही कराया है।

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साथियों,

कवि केशवसुत का एक पद है- “जुनें जाऊं द्या, मरणालागुनि जाळुनि किंवा, पुरुनि टाकासडत न एक्या ठायी ठाका, यानी हम पुरानी सोच पर थमे नहीं रह सकते। मानवीय सभ्यता, विचार और भाषा लगातार evolve होते रहते हैं। आज भारत दुनिया की सबसे प्राचीन जीवंत सभ्यताओं में से एक है। क्योंकि, हम लगातार evolve हुये हैं, हमने लगातार नए विचारों को जोड़ा है, नए बदलावों का स्वागत किया है। भारत में दुनिया की सबसे बड़ी भाषाई विविधता इसका प्रमाण है। हमारी ये भाषाई विविधता ही हमारी एकता का सबसे बुनियादी आधार भी है। मराठी खुद इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। क्योंकि, हमारी भाषा उस माँ की तरह होती है, जो अपने बच्चों को नए से नया, अधिक से अधिक ज्ञान देना चाहती है। माँ की तरह ही भाषा भी किसी से भेदभाव नहीं करती। भाषा हर विचार का, हर विकास का आलिंगन करती है। आप जानते हैं, मराठी का जन्म संस्कृत से हुआ है। लेकिन, इसमें उतना ही प्रभाव प्राकृत भाषा का भी है। ये पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ी है, इसने मानवीय सोच को और अधिक व्यापक बनाया है। अभी मैंने लोकमान्य तिलक जी की गीता रहस्य का ज़िक्र किया। गीता रहस्य संस्कृत गीता की व्याख्या है। तिलक जी ने मूल गीता के विचारों को लिया, और मराठी बोध से उसे और ज्यादा जन-सुलभ बनाया। ज्ञानेश्वरी गीता में भी संस्कृत पर मराठी में टिप्पणी लिखी गई। आज वही ज्ञानेश्वरी देश भर के विद्वानों और संतों के लिए गीता को समझने के लिए एक मानक बन गई है। मराठी ने दूसरी सभी भारतीय भाषाओं से साहित्य को लिया है, और बदले में उन भाषाओं को भी समृद्ध किया है। जैसे कि भार्गवराम बिट्ठल वरेरकर जैसे मराठी साहित्यकारों ने ‘आनंदमठ’ जैसी कृतियों का मराठी अनुवाद किया। विंदा करंदीकर, इनकी रचनाएँ तो कई भाषाओं में आईं। उन्होंने पन्ना धाय, दुर्गावती और रानी पद्मिनी के जीवन को आधार बनाकर रचनाएँ लिखीं। यानी, भारतीय भाषाओं में कभी कोई आपसी वैर नहीं रहा। भाषाओं ने हमेशा एक दूसरे को अपनाया है, एक दूसरे को समृद्ध किया है।

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साथियों,

कई बार जब भाषा के नाम पर भेद डालने की कोशिश की जाती है, तो हमारी भाषाओं की साझी विरासत ही उसका सही जवाब देती है। इन भ्रमों से दूर रहकर भाषाओं को समृद्ध करना, उन्हें अपनाना, ये हम सबका सामूहिक दायित्व है। इसीलिए, आज हम देश की सभी भाषाओं को mainstream language के रूप में देख रहे हैं। हम मराठी समेत सभी प्रमुख भाषाओं में शिक्षा को बढ़ावा दे रहे हैं। अब महाराष्ट्र के युवा मराठी में हायर एजुकेशन, इंजीनियरिंग और मेडिकल की पढ़ाई वहां का युवा आसानी से कर सकेंगे। अंग्रेजी न जानने के कारण प्रतिभाओं की उपेक्षा करने वाली सोच को हमने बदल दिया है।

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साथियों,

हम सब कहते हैं कि हमारा साहित्य समाज का दर्पण होता है। साहित्य समाज का पथप्रदर्शक भी होता है। इसीलिए, साहित्य सम्मेलन जैसे कार्यक्रमों की, साहित्य से जुड़ी संस्थाओं की देश में बहुत अहम भूमिका होती है। गोविंद रानडे जी, हरिनारायण आप्टे जी, आचार्य अत्रे जी, वीर सावरकर जी, इन महान विभूतियों ने जो आदर्श स्थापित किए, मैं आशा करता हूँ, अखिल भारतीय मराठी साहित्य महामंडल उन्हें और आगे बढ़ाएगा। 2027 में साहित्य़ सम्मेलन की इस परंपरा को 150 वर्ष पूरे होंगे। और तब 100वां सम्मेलन होगा। मैं चाहूँगा, आप इस अवसर को विशेष बनाएँ, इसके लिए अभी से तैयारी करें। कितने ही युवा आजकल सोशल मीडिया के जरिए मराठी साहित्य की सेवा कर रहे हैं। आप उन्हें मंच दे सकते हैं, उनकी प्रतिभा को पहचान दे सकते हैं। ज्यादा से ज्यादा लोग मराठी सीखें, इसके लिए आप ऑनलाइन platforms को, भाषिणी जैसे initiatives को बढ़ावा दें। मराठी भाषा और साहित्य को लेकर युवाओं के बीच प्रतियोगिताओं का आयोजन भी किया जा सकता है। मुझे विश्वास है, आपके ये प्रयास, और मराठी साहित्य की प्रेरणाएं विकसित भारत के लिए 140 करोड़ देशवासियों को नई ऊर्जा देंगे, नई चेतना देंगे, नई प्रेरणा देंगे। आप सभी महादेव गोविंद रानडे जी, हरि नारायण आप्टे जी, माधव श्रीहरि अणे जी, शिवराम परांजपे जी, जैसे महान व्यक्तित्वों की महान परंपरा को आगे बढ़ाएं, इसी कामना के साथ, आप सभी का एक बार फिर बहुत-बहुत धन्यवाद!